नवरात्रि के 5वें दिन आदिशक्ति के स्कंदमाता की पूजा का विधान है

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नवरात्रि के 5वें दिन आदिशक्ति के स्कंदमाता की पूजा का विधान है

महेंद्र मिश्रा,रायगढ़, नवरात्रि का पर्व 9 दिनों तक मनाया जाता है. नवरात्रि में हर दिन मां दुर्गा के अलग-अलग अवतारों की पूजा की जाती है. नवरात्रि के 5वें दिन आदिशक्ति के स्कंदमाता की पूजा का विधान है. नवरात्रि का 5वें दिन स्कंदमाता को समर्पित होता है. इन्हें पद्मासनादेवी भी कहते हैं.कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इनका नाम स्कंदमाता पड़ा. इस दिन स्कंदमाता की पूजा करने से जीवन मे सुख और शांति आती है. स्कंदमाता मोक्ष प्रदान करने वाली देवी हैं. माता का स्वरूप चार भुजाऔं वाला हैं. इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है. बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है, उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं.इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है. ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं. माना जात है कि स्कंदमाता अपने भक्तों से बहुत जल्द प्रसन्न हो जाती है. ऐसी मान्यता है कि स्कंदमाता की पूजा करने से मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं. वहीं नि:संतान को माता के आर्शीवाद से संतान प्राप्ति होती है. मां स्कंदमाता को केले का भोग लगाया जाता है.नवरात्रि के पांचवें दिन स्नान आदि से निवृत हो जाएं और फिर इस दिन पीले रंगे के कपड़े पहनकर माता की पूजा करें, स्कंदमाता का स्मरण करें. इसके पश्चात स्कंदमाता को अक्षत्, धूप, गंध, पुष्प अर्पित करें. उनको बताशा, पान, सुपारी, लौंग का जोड़ा, किसमिस, कमलगट्टा, कपूर, गूगल, इलायची आदि भी चढ़ाएं. फिर स्कंदमाता की आरती करें. माना जाता है स्कंदमाता की पूजा करने से भगवान कार्तिकेय भी प्रसन्न होते हैं.

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नवरात्रि के 5वें दिन आदिशक्ति के स्कंदमाता की पूजा का विधान है

महेंद्र मिश्रा,रायगढ़, नवरात्रि का पर्व 9 दिनों तक मनाया जाता है. नवरात्रि में हर दिन मां दुर्गा के अलग-अलग अवतारों की पूजा की जाती है. नवरात्रि के 5वें दिन आदिशक्ति के स्कंदमाता की पूजा का विधान है. नवरात्रि का 5वें दिन स्कंदमाता को समर्पित होता है. इन्हें पद्मासनादेवी भी कहते हैं.कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इनका नाम स्कंदमाता पड़ा. इस दिन स्कंदमाता की पूजा करने से जीवन मे सुख और शांति आती है. स्कंदमाता मोक्ष प्रदान करने वाली देवी हैं. माता का स्वरूप चार भुजाऔं वाला हैं. इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है. बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है, उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं.इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है. ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं. माना जात है कि स्कंदमाता अपने भक्तों से बहुत जल्द प्रसन्न हो जाती है. ऐसी मान्यता है कि स्कंदमाता की पूजा करने से मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं. वहीं नि:संतान को माता के आर्शीवाद से संतान प्राप्ति होती है. मां स्कंदमाता को केले का भोग लगाया जाता है.नवरात्रि के पांचवें दिन स्नान आदि से निवृत हो जाएं और फिर इस दिन पीले रंगे के कपड़े पहनकर माता की पूजा करें, स्कंदमाता का स्मरण करें. इसके पश्चात स्कंदमाता को अक्षत्, धूप, गंध, पुष्प अर्पित करें. उनको बताशा, पान, सुपारी, लौंग का जोड़ा, किसमिस, कमलगट्टा, कपूर, गूगल, इलायची आदि भी चढ़ाएं. फिर स्कंदमाता की आरती करें. माना जाता है स्कंदमाता की पूजा करने से भगवान कार्तिकेय भी प्रसन्न होते हैं.